खामोश तारों की सरगम
रमेश बाबू एक शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। उनकी दुनिया उनके काम और उनके बेटे, आदित्य, के इर्द-गिर्द घूमती थी। आदित्य बड़ा होकर एक मशहूर संगीतकार बना। उसके गाने लाखों दिलों को छूते थे, पर अपने पिता के साथ उसका रिश्ता हमेशा से कुछ खामोश सा रहा। दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे, ये उन्हें पता था, पर कभी खुलकर इज़हार नहीं कर पाते थे। शब्दों से ज़्यादा उनकी बातें चुप्पी में होती थीं।
आदित्य जब भी घर आता, रमेश बाबू बस उसे देखते रहते। कभी उसके खाने की थाली में चुपचाप उसकी पसंदीदा मिठाई रख देते, तो कभी देर रात तक रियाज़ करते देख बस मुस्कुरा देते। आदित्य भी समझता था। जब उसे बुखार होता, तो पापा का हाथ उसके माथे पर सबसे पहले होता। जब वो उदास होता, तो पापा बिना कुछ कहे उसके लिए चाय बना लाते।
एक दिन आदित्य को एक बड़े संगीत समारोह के लिए एक नया गीत बनाना था। वह हफ्तों से कोशिश कर रहा था, पर उसे उसे धुन नहीं मिल रही थी। वह तनाव में था। उसने अपने पिता को बताया कि वह एक ऐसी धुन चाहता है जो 'खामोश प्यार' को दर्शाए, उस प्यार को जो शब्दों से परे हो। रमेश बाबू ने बस उसे देखा और मुस्कुरा दिए।
अगली सुबह, आदित्य को अपने पियानो पर एक पुरानी, धूल जमी डायरी मिली। यह उसके पिता की थी। डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे, और उनमें हाथ से लिखे कुछ अधुरे संगीत के नोट्स थे। आदित्य को याद आया कि उसके पिता कभी कॉलेज में पियानो बजाया करते थे, पर फिर उन्होंने नौकरी और परिवार के लिए उसे छोड़ दिया था।
उन नोट्स में से एक धुन थी, अधूरी, पर दिल को छू लेने वाली। आदित्य ने उसे बजाया, और जैसे ही उसने पहला नोट दबाया, उसे लगा जैसे उसके पिता की खामोश बातें धुन बन कर बह रही हों। उस धुन में वो प्यार था जो कभी कहा नहीं गया, वो समर्पण था जो कभी जताया नहीं गया, और वो त्याग था जो कभी गिना नहीं गया।
आदित्य ने उस धुन को पूरा किया, उसमें अपने शब्दों को पिरोया। जब उसने समारोह में वह गाना गाया, तो हर आँख नम थी। गाने का नाम था, **"अनकही सरगम"**। मंच से नीचे उतरकर, आदित्य सीधे अपने पिता के पास गया। रमेश बाबू की आँखों में चमक थी। उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस अपना हाथ बढ़ाया और आदित्य के कंधे पर रख दिया।
उस स्पर्श में वो सब कुछ था जो सालों की खामोशी में छिपा था। आदित्य ने पहली बार महसूस किया कि उसके पिता का प्यार किसी भी गीत से ज़्यादा मधुर था, किसी भी धुन से ज़्यादा गहरा था। उस दिन, पिता और पुत्र के बीच की 'खामोश तारों की सरगम' पूरी हो गई थी, जिसे अब शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।
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