🕰️ कविता: समय की चाल
🌃 रात बोली —
“मैं चुपचाप आती हूँ, तारे संग मुस्काती हूँ,
हर थके हुए मन को सुलाती हूँ।
सपनों की दुनिया दिखाती हूँ,
पर जो जागे, उन्हें रहस्य सिखाती हूँ।”
🌅 सुबह बोली —
“मैं नयी उम्मीदें लाती हूँ, ओस की बूँदों-सी शीतल छाँव बन जाती हूँ।
जो समय पर उठते हैं, मैं उनका साथ निभाती हूँ,
अलार्म से पहले जो जागें, उन्हें खुशियाँ दे जाती हूँ।”
🌞 दिन बोला —
“मैं मेहनत का नाम हूँ, रोशनी का काम हूँ,
जो पसीना बहाए, मैं उसका ईनाम हूँ।
सच्चाई से जो जीए, मैं उसकी पहचान हूँ,
हर पल की कीमत बताता हूँ, मैं ही जीवन की जान हूँ।”
🌇 शाम बोली —
“मैं सोच की घड़ी हूँ, दिनभर की कड़ी कड़ी हूँ।
आराम का वक्त हूँ, रिश्तों की मिठास हूँ,
मैं बताती हूँ — कल क्या ठीक, क्या बेमोल था,
मैं सिखाती हूँ, हर अंत एक नई शुरुआत का रोल था।”
⏳ समय ने कहा —
“मैं ही जादू हूँ, मैं ही सवाल हूँ,
जिसने मुझे समझा, वही कमाल हूँ।
ना मैं रुकता, ना मैं थमता,
जो मेरे संग चला, वही जीवन को समझता।”
©️ Dhiraj Kumar द्वारा लिखित





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