फुआ के घर की चाह
नन्हीं आँखों में एक सपना,
फुआ का आँगन था अपना।
जिद थी मेरी, बात थी पक्की,
ले चलो मुझे, अब नहीं रुक सकी।
फुआ ने पकड़ाया एक सिक्का,
दस रुपये का, चमचमाता टुकड़ा।
बोलीं, "घर बहुत दूर है, बेटा,
ये ले, पर मैं ले जा नहीं सकता।"
बात अधूरी, मन था रूठा,
गुस्से में वो सिक्का मैंने फेंका।
ना देखा दायाँ, ना देखा बायाँ,
फेंक दिया, न रहा उसका साया।
सिक्का तो गया, मिला भी नहीं,
पर फुआ का घर भी मिला नहीं।
वो दस रुपये, थे नहीं कुछ खास,
बड़ा था फुआ के घर जाने का आस।
फुआ के घर की चाह (जारी)
समय बदला, मैं बदल गया,
पर उस गली का रास्ता आज भी मेरे लिए थम गया।
बचपन की वो छोटी सी चोट,
आज भी भीतर कहीं है एक खोट।
क्या थी वो एक ज़िद नादान,
या था वो रिश्तों का टूटा मान?
सोचता हूँ अब, क्या था वो पल,
जो भर गया आँखों में जल?
क्या वो दस रुपये थे इतने कम,
कि नहीं जा सका, थम गए मेरे कदम?
शायद नहीं, वो रुपये की बात न थी,
टूटी वो एक आस, जो सच्ची थी।
एक बच्चे का विश्वास जब टूटा,
तो फिर न उस डोर को कभी बूँटा।
आज भी जब देखता हूँ वो गली,
अजीब सी एक चुप्पी सी छाई मिली।
फुआ का घर, जो कभी अपना था,
आज बस यादों का एक सपना था।
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